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Sunday, December 25, 2016

Kavita

सुबह से ही छत की मुँडेर पे कागा बोल रहा है काँव।
आ रहा शायद परदेशी मुझसे मिलने मेरे गाँव।
फिर बागों में चलके मुझको झुला खूब झुलाएगा।
या खुद को बड़ा समझकर बेकल दूर खड़ा सरमाएगा।
पूछेगा मुझसे मिलकर कह दो कि प्यार मैं करती हूँ।
सच को धोखा देकर फिर से कह दूंगी मैं ना करती हूँ।
वो पागल दिल ठहरा ना मुझको छोड़ के जाएगा।
मेरी ना को चतुराई से हाँ बस हाँ कर जाएगा।
फिर दौड़ के अपनी बाँहो में मुझको भर लेगा वो शायद।
या फिर से रूठ के पगला मुझको खूब सताएगा शायद।
मन चंचल है ख्वाब ये अपना खुद से ही बुन जाएगा।
टुटेगा हर सपना जब परदेशी ना कोई आएगा।

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