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Sunday, December 29, 2013

मोहब्बत जिन्दाबाद


गुजरते वक्त में
उम्र की थकावट
साफ साफ झलकती हुई
चेहर पर झुर्रियाँ
इठलाती सी
और आईना मुस्काती सी

वाय द वे
आईना क्यूँ मुस्काराती है
ये पता नहीं
पर
मैं तो मुस्कुराता हुँ
अब भी
आईने में तुम्हें देखकर
कमर झुकी हूई
हाथ में लाठी
मोटे मोटे शीशे वाला चश्मा
दूध सी सफेद बाल
और
लटके लटके गाल


तुमसे बिछड़ने के बाद
समझौता तो करना पड़ा
खुद के साथ ही
पर
हमारी साधारण सी मोहब्बत
हमेशा
साथ साथ चलती रही

गोलगप्पे की दूकान पर
एक तुम्हारे हिसाब से
तीखी
एक मेरी तरह का
सूखा सूखा

सफर में
दूर से
बहुत दूर से
हाथ हिलाती हुई
हैप्पी जर्नी

और
तनहाई के आलम में
एकदम खामोश
मगर
गुँजती हूई
मोहब्बत जिन्दाबाद
मोहब्बत जिन्दाबाद
मोहब्बत जिन्दाबाद

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