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Sunday, December 29, 2013

मोहब्बत जिन्दाबाद


गुजरते वक्त में
उम्र की थकावट
साफ साफ झलकती हुई
चेहर पर झुर्रियाँ
इठलाती सी
और आईना मुस्काती सी

वाय द वे
आईना क्यूँ मुस्काराती है
ये पता नहीं
पर
मैं तो मुस्कुराता हुँ
अब भी
आईने में तुम्हें देखकर
कमर झुकी हूई
हाथ में लाठी
मोटे मोटे शीशे वाला चश्मा
दूध सी सफेद बाल
और
लटके लटके गाल


तुमसे बिछड़ने के बाद
समझौता तो करना पड़ा
खुद के साथ ही
पर
हमारी साधारण सी मोहब्बत
हमेशा
साथ साथ चलती रही

गोलगप्पे की दूकान पर
एक तुम्हारे हिसाब से
तीखी
एक मेरी तरह का
सूखा सूखा

सफर में
दूर से
बहुत दूर से
हाथ हिलाती हुई
हैप्पी जर्नी

और
तनहाई के आलम में
एकदम खामोश
मगर
गुँजती हूई
मोहब्बत जिन्दाबाद
मोहब्बत जिन्दाबाद
मोहब्बत जिन्दाबाद

Saturday, December 28, 2013

दूर चले जा

बेशक
अब किसी के दिल में
नहीं रहता हूँ
खुद पे ही जुल्म करके
खुद को ही सहता हूँ
अपने जख्मों को ले
कहीं दूर चले जा
मैं अब भी तीखा सच
खूब कहता हूँ

Monday, December 23, 2013

I dont like to say b-bye 2013

नहीं कहना चाहता मैं अलविदा दिल से।
तुम्हे नहीं कर सकता कभी भी जुदा दिल से।
बहुत कुछ खोया है तुम्हारे साथ चलकर, मगर उससे भी कहीं अधिक पाया उसका क्या।
कुछ रिश्ते युँही बिखर गए खुशबु की तरह, मगर कितने ही गहरे सम्बन्ध बने उसका क्या।
हे नववर्ष मुझे आपके स्वागत से ऐतराज नहीं।
मगर पुर्व प्रेमी को दिल में रखने से लाज नहीं।
मन व्याकुल बस यह सोच कर होता है।
किसी के आने से दिल क्यों किसी को खोता है।
तुम रहो खड़े बस द्वार पे ही,स्वागत का दीप जलाता हुँ।
विदा की अंतिम बेला में, मैं पिया से मिलकर आता हुँ।

Sunday, December 22, 2013

JAI HO

बिन पिये ही रोज लौट आता हूँ मैखाने से
मैपरस्त नया हूँ शराब भी नई चाहिये

Thursday, December 19, 2013

gazal

_
दिल मेरा फरेब में पलता रहा
मैं बस आँख मूँदकर चलता रहा
शौक था पल दो पल उसके साथ का
उम्रभर वो साथ ही सलता रहा
वो खुलूसे इश्क हिम सा था सही
पास आने तक मगर गलता रहा
जिंदगी थी नाम उसके इसलिये
हाथ रखकर हाथ में मलता रहा

पैगाम आखिरी

_
ना आना कि 
तेरा इन्तजार आखिरी
ये जाम आखिरी 
ये शाम आखिरी
आखिरी है लड़ाई
आखिरी है मोहब्बत
सारी शिकायते 
गिले तमाम आखिरी
अब चैन की आरजू 
बस आखिरी आखिरी है
अब कहाँ लबों पे राम आखिरी है
बस तेरा नाम आखिरी है
चंद जिद्दी जज्बातो से दो चार हो जाऊँ
फिर
दौर ए वफा मुफलिसों को पैगाम आखिरी
तब तक
खिड़कियाँ खोल बैठो
जनाजे को चाहिये
तेरा सलाम आखिरी

तुम नहीं रहे

_
हाँ तुम नहीं रहे
हमारी जिन्दगी में
यह विचित्र फैसला भी
तुम्हारा ही था
मरे आहत होने का आलम
बेइन्तहा था
निवाला जहर दिखता था
और दुआ बेअसर
नींद ना जाने तुम्हारे साथ ही कब के चली गई
हाँ मगर
सपने अपने साथ थे
उन सपनों को भी पता था
कि अब वह
झुठी नींदों के सहारे
अस्तित्व विहिन सच का सामना कर रही है
मगर
आँखों को उनका देखना तय था
शायद आदतन
दिल तो फिर भी नासमझ है
कैसे समझाऊँ
कि
तुम नहीं रहे