Translate

Thursday, April 4, 2013

कागज की किस्मत

कलम हाथ में थी
और
गजल सामने खड़ी मुस्कुरा रही थी
दिल और दिमाग 
लगा रहे थे शब्दों के भँवर में डुबकियाँ
कमबख्त
कागज की किस्मत हो कोरी थी

4 comments:

  1. कागज़ कहां कोरा रह सकता है !

    ReplyDelete
  2. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (6-4-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

    ReplyDelete