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Friday, April 26, 2013

सतयुग की ओर

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ग्रंथों मेँ लिखा है
सतयुग में
औरते
खुद ही चिता पर जलती थी

आज भी
पुलिस की रिपोर्टों में कैद
परंपरा

हम बढ़ रहे हैं
सतयुग की ओर

मुखिया जी
पँचायत बैठाए हैं
कैसे भी हो
बात आगे नहीं जाएगी
तभी
हमारा समाज बढेगा
सतयुग की ओर

तुम औरत हो
इसलिए हद में रहो
तुम्हारा मौन ही
हमें ले जाएगा
सतयुग की ओर

इतिहास लिखने की जिम्मेदारी
मर्दों के हाथ है
हम तुम्हें भी लिखेगे
शक्ति का नाम देगें
समय निकल चला है
सतयुग की ओर

चलो कुछ दँगे करवा लें
जेहाद मजबुत कर लो
भगवा हर तरफ दिखनी चाहिए
तभीँ . . . . . . . . . . . .
सतयुग .. की ओर

शम्भू साधारण

Thursday, April 25, 2013

पुरूषों के प्रति नफरत की वजह ?

हाँ
मैं नहीं पुछूँगा
तुम्हारे पुरूषों के प्रति
नफरत की वजह
मगर
तनिक सोचना
क्या वह नारी जानती थी
कि
उसके कोख से भेड़िया पैदा लेगा
मित्रों
गुलशन में बबूल उग आया है
चलो सब मिलकर काटते हैं
तर्क वितर्क धरातल पर हो
हवा में बातें फुस्स्स हो जाती है

Sunday, April 21, 2013

मोहब्बत की औकात

सुनो
जा रहे हो
जाओ
मगर
अब जब आना
तुम अपना 'मौन' साथ लाना
मैं भी अपने सारे शब्दों की गठरी
चुप्पी के हवाले कर आऊँगा
चलो तय करलो
कि
निगाहों से भी
कोई फुसफुसाहट नहीं
नहीं सुनी जायेगी
धड़कनों की आवाज
बस
महसूसना है
पहली मुलाकात की मुस्कुराहट

aur
कल की नाराजगी
ताकि
मोहब्बत को भी
पता चले
उसकी औकात

Thursday, April 4, 2013

कागज की किस्मत

कलम हाथ में थी
और
गजल सामने खड़ी मुस्कुरा रही थी
दिल और दिमाग 
लगा रहे थे शब्दों के भँवर में डुबकियाँ
कमबख्त
कागज की किस्मत हो कोरी थी

Tuesday, April 2, 2013

मरा जा रहा है

_ चाहत_ आँखे ललायित है बस एक नजर तुम्हें देख लें इसी चाहत में रोज खिली खिली सी खुलती है कानों को तुम्हारी आवाज के सिवा कहाँ कुछ भाया है कभी धड़कनों को समेटे साँसों में जोश भरकर निकल पड़ता है सन्नाटे की तरफ होठ अब भी सिर्फ तुम्हारे प्रत्युत्तर में खुलने को आतुर सँजो सँजो के रख रहा है खुबसूरत शब्दों को बस एक दिल है जो मरा जा रहा है अपने ही जिद पर अड़ा जा रहा है चुपचाप तनहा अकेला इसे चमत्कारों पे भरोसा नहीं

Monday, April 1, 2013

अकड़ता रहूँगा

तू टूटेगी तो बिखर मैं जाऊँगा
बेहतर है
तू गुस्सा रह
मैं अकड़ता रहूँगा