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Sunday, July 1, 2012

प्यार का गुणनखंड कठिन जरूर मगर हल होते ही चक्रवृद्धि ब्याज के मिश्रधन की तरह परिणाम गलती होते ही व्यंजक की तरह दिल का टूटना तय इसलिये कैलकुलेशन का ध्यान हमेशा रखें प्रेम एक मात्र ऐसा जज्ब है जो शुरू तो शुन्य से होता है लेकिन अन्त अनन्त प्रेम समुच्चय के दोनों पद यानी मैं और तुम परस्पर एक दूसरे को समर्पित वरना समीकरण का बिगरना तय और फिर जिन्दगी कभी ना मिलने वाली दो समानांतर रेखायें फिर दोषार्पन में जिन्दगी खत्म मित्रों वफा या बेवफा तय नहीं तय सिर्फ समर्पण की भावना रहे हाँ कई गुणनखण्डों के हल शुन्य हो सकते हैं मगर प्रेम के मामले में ये अपवाद तक नहीं

तोड़ जाते हैं दिल अपने ही छलकर के
दुश्मन नहीं आते आसमां से चलकर के
वफा का सुरज जब पुरब से पश्चिम जाये
मोहब्बत रौशन कर आना खुद ही जलकर के

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प्रेम : त्याग का दुसरा नाम
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. . . . . . . .MIND IT. . . . .