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Monday, June 25, 2012

कुछ तो है काम खूनी तेरी निगाह का शमशान सा क्योँ अक्स तेरे दरगाह का आईना कह रहा है आज चीख चीखकर आई हो कत्ल करके किसी बेगुनाह का

तेरे बगैर भी देखो जी के मस्त रहता हूँ तुझे सोचकर भी होंठ सी के मस्त रहता हूँ ये और बात है कि तनहा रह नहीं सकता दोस्ती जाम से की और पी के मस्त रहता हूँ

सच को अगर सच कहना गुनाह है बेशक यहाँ हमारा रहना गुनाहहै खाया हूँ ईँट दिल पर पत्थर तो मारूँगा लाचार होके जुल्म को सहना गुनाह है 7

तलवारें भी कदमों तले गुमनाम सी होगी मोहब्बत की खुशबू बिखरने की बात है