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Sunday, December 30, 2012

कभी कभी

कभी कभी
भूल जाता हूँ
खुद की उपस्थिति

मोहब्बत
तुम
तनहा होने से बचना

जुर्म के खिलाफ

सुनो
चुप रहना
जब तलक कि
तुम्हारी खुद की पीड़ा
तुम्हें तोड़ न दे
बेशक लाठियाँ लेकर
गुमनाम से
बन जाओगे
किसी जुलूस का हिस्सा
मगर चुप रहना
जब तलक
तुम्हारी खुद की कोख
उजड़ न जाए
बेशक बयानबाजी का दौड़ है ये
मगर
लाठी के दौड़ आने तक
चुप रहना
क्योंकि
मर्द होने पे अब गर्व नहीं होता
जेल जाना आम तो नहीं
पर आम आदमी का
जेल जाना
निदान भी नहीं
एक छोटी सी फुँफकार
उथल पुथल मचा देती है
जुलूस टुकड़ों में
गिरती पड़ती नजर आती है
और
इन्सानियत
खबरों तक सिमटकर
सिसकने लगती है
अब बागी दिखना आसान है
बागी होना नामुमकिन
अब न्याय माँगना
बस इत्सिहार लगता है
जुलूस और नारे
खबरों का मसाला बन गया है
अब बदलाव संभव नहीं
चाहो तो बलिदान देकर देख लो
कफन को तरस जायेगी
तुम्हारी लाश
अब कृष्ण बहुत हैं
अर्जुन नगन्य
चलो
फिल्में देखते हैं
मनोरंजन करते हैं
अब कोई नाम नहीं
जिसका जिन्दाबाद हो
जुर्म के खिलाफ आवाज नहीं
अब
हथियार उठनी चाहिये

Thursday, December 6, 2012

अपवाद-ए-जिन्दगी

सँभाले रख रहा हूँ अपवाद-ए-जिन्दगी
आईना दिखाऊँगा मैं मुकद्दर को एकदिन

कह लेना

कोई पागल समझ लेना, कोई दीवाना कह लेना।
कोई वादा अगर टूटे, तो फिर बेगाना कह लेना॥
मैं बेगैरत नहीं हूँ पर, मुझे अपनों से लगता डर।
नजर मिलते ही झुक जाये, तो फिर अन्जाना कह लेना॥

Wednesday, December 5, 2012

दूर से साहब

बदले मिजाज मौसम बदला है रहनुमाँ
सजदे में सर झुकाना अब दूर से साहब

Sunday, December 2, 2012

♥ अकेला ♥


अक्सर भीड़ में हो जाता हुँ अकेला.
नजरेँ थक जाती है.
मन बेचैन हो उठता है.
फिर,
कोसता हुँ खुद को,
और भागता हुँ,
अकेलेपन की तरफ.
जहाँ,
बड़ी बेसब्री से,

इन्तजार कर रही होती है.
तुम्हारी यादें,
जो समेट लेती है,
मुझको.
मिट जाती है
तन्हाई
और नहीं रह पाता हुँ
अकेला

Friday, November 30, 2012

गुनाह

यूँ तो
रिश्वत लेना और देना,
दोनों ही गुनाह है
मगर
मोहब्बत के मामले में
ये अपवाद है

Wednesday, November 28, 2012

क्रोध_तुम्हारी जरूरत नहीं

सुनो
अंदर आने से पहले
वहीं दरवाजे पर
खड़े खड़े
सुनो
कहाँ आये हो
ये रौबदार चेहरा लिये
क्या लगता है
मैं डर जाऊँगा
तुम्हारी लाल लाल आँखों से
और
और तुम्हारे हाथ की लाठी से
नहीं रे
देखो मेरी आँखों में
प्रतिशोध की ज्वाला
शांत हो चुकी है
चेहरे पर
प्रेम की परछाई
दिख रही होगी
. .
क्रोध
अब यहाँ
तुम्हारी जरूरत नहीं

जाओ ढूँढ़ लेना
कोई ठिकाना
जहाँ
प्रेम मर चुका होगा

बना लेना उसके अंदर घर
जिसकी आत्मा मर चूकी होगी

Tuesday, November 27, 2012

मोहब्बत_बेईमान बना देगी

हाँ
जीवन के उतार चढ़ाव में
कड़कती धूप
और
सुहानी छाँव में
शहर की भागदौड़
या
मेले वाली गाँव में
निरंतर

लगातार
मैं तुम्हार हाथ
थामें रखूँगा
मगर
रस्मों के बिसात पर
कुछ कसमों का टूटना तय है
देखना
एक दिन तुम्हें भी
मोहब्बत
बेईमान बना देगी

Monday, November 26, 2012

कविता फिल्म

 एक नई पहल

कविता की नई भाषा, shabd अब मौन नही

http://ssadharan.blogspot.in/p/kavita-films.html

दोहे

. . . . . . . . . . . . . . . .

जहाँ कहीं भी हो अगर, सुन्दरता की बात।
सीरत आगे हुश्न की, फीकी है औकात॥

अगर बुरा देखो कहीं, मुँह पे रखना हाथ।
लाठी लेकर सत्य के, रहना हरदम साथ॥

चाँदी सा मुखड़ा मिला, सोने सा व्यवहार। 
माया के संसार में, मत जाना तू हार॥


आदत सी अब हो चली, छोटे कपड़े यार।
फैशन में भूले सभी, तन की ईज्जत यार॥

आओ मिलकर सब करें, सीरत का गुणगान।
प्रेम मुहब्बत को तभी, मिल पाये सम्मान॥

Sunday, November 25, 2012

क्या तुम मुझे मिल सकती हो........मेरी ही तनहाई में


सुनो
हमारी मोहब्बत
एकदम साधारण सी है ना

तुम्हारे होंठ
बस तुमसा ही लगा
कहाँ किसी गुलाब में वो हँसी पायी

चेहरा
आदतन
जब चाँद दिखता है
तो तलाशने लगता हूँ
तेरा अक्स
पर कहाँ कभी चाँद तुमसा हो पाया है

वजह तो नहीं
पर तलाशने लगता हूँ
फिल्मों की नायिकाओं की
रूप रेखा नैन नक्श
रैपरों और पोस्टरों में छपी
मॉडलों में
पर कहाँ कोई तुमसा दिखा

नींद में
कभी पास आते आते
सपनों का टूट जाना
या फिर
यादों में
तस्वीर जब धूँधलेपन से उभरना चाहती हो
तो आँखों का भर आना

कहाँ
कहाँ कुछ भी
जहाँ तुम हो

डायरी के पन्नों में
खट्टी मीठी यादों को
कई बार समेट लेने की
नाकाम कोशिश
झलकते तो हैं
कुरकुरे का पैकेट
क्लास रूम की कुर्सीयाँ
दोस्तों के शोरगुल
टीचर्स की डाँटें
पर तुम कहाँ

लुकाछिपी का खेल खत्म करके
क्या तुम मुझे मिल सकती हो
मेरी ही तनहाई में
कभी पुरानी पीपल तले
कभी गाँव की पगडंडी में
कभी खिलखिलाते खेतों में
कभी रिमझिम बरसात में
या फिर अकेली रात में. . . . . . . . . .

Saturday, November 24, 2012

मुकाम कीजिये

मासूम हौंसलों को सलाम कीजिये
मोहब्बत के रास्ते में कुछ नाम कीजिये
सोचा बहुत ने नेकी के वास्ते यहाँ
धरातल पे मगर उनको मुकाम कीजिये

मोहब्बत सौदा नहीं

मोहब्बत में मोहब्बत की तलाश हो
सौदा नहीं कि जख्मों का हिसाब हो

Thursday, November 22, 2012

हवा

हवा. . .
क्या तुम मेरा साथ दोगी!
अरमानों की डोर से बँधी
एक बड़ी सी
ख्वाबों की पतंग लाया हूँ
कल की गुप्तगू में
आज आने का वादा था
इसलिये
जब में अपने अरमानों को ढील दूँ
...
तुम मेरी पतंग को उपर ले जाना
मुझे मालूम है
वो वादा नहीं तोड़ेगा
चुपचाप पतंग पर बैठ
चाँद नीचे आयेगा
बोलो
तुम साथ दोगी ना!

"साधारण" सी बात होनी चाहिये gazal

बात कुछ भी ना हो पर बात होनी चाहिये।
रोज ही इक दफा मुलाकात होनी चाहिये॥
दो इश्क साथ हो या फिर रकीबों की जंग हो।
दोनों की एक सी हालात होनी चाहिये॥
यूँ ना गलियों में होकर के बेनकाब चलो।
चाँद देखे कोई तो रात होनी चाहिये॥
जात मजहब का मुबारक खुदा तुमको लेकिन।
आदमी की भी कोई जात होनी चाहिये॥
जन्मोत्सव में दारू की बोतल ना तोड़िये।
खुशी में "साधारण" सी बात होनी चाहिये॥

'लवर'

जब कोई पुछता है
तुम मेरी कौन हो?
क्षणिक निःशब्द हो जाता हूँ
तीव्र गति से
कुछ चित्र
उभरने और मिटने की दौड़ में
जो वर्षों से अंकित
मेरे मानस पटल पर
हर्षोल्लास को नहीं खोने की कोशिश में
सरल आशामय
...
प्रेरक
जीवन तार को झँकृत करती हुई
मुझसे कहती
कि चुप ना रहो
और मैं
प्रेयसी
प्रियतमा
आदि कहकर बोझिल नहीं रह सकता
इसलिए
सीधे ही
अत्याधुनिक शब्दों में
कह देता हूँ
तुम मेरी 'लवर' हो

gazal


करती है लाखों प्यादे बहाल जिन्दगी।
चलती है मगर अपनी ही चाल जिन्दगी॥
अभी मौज मस्ती में खो गये हो तुम।
पुछेगा तुमसे एक दिन सवाल जिन्दगी॥
गैरों के गम में खुशियाँ तूभर दे अगर।
तुझको भी करेगा मालामाल जिन्दगी॥
जो झुठ और फरेब के तू साथ जाएगा।
बेशक तो होगी एक दिन बबाल जिन्दगी॥
वतन के वास्ते अगर तू काम आयेगा।
तो मौत के बाद भी है कमाल जिन्दगी॥


ना जाने किस शब्द से आहत होकर तुने चिट्ठी फाड़ दी
अँतिम लाईन पढ़ते तो मुस्कुरा दिये होते

Sunday, July 1, 2012

प्यार का गुणनखंड कठिन जरूर मगर हल होते ही चक्रवृद्धि ब्याज के मिश्रधन की तरह परिणाम गलती होते ही व्यंजक की तरह दिल का टूटना तय इसलिये कैलकुलेशन का ध्यान हमेशा रखें प्रेम एक मात्र ऐसा जज्ब है जो शुरू तो शुन्य से होता है लेकिन अन्त अनन्त प्रेम समुच्चय के दोनों पद यानी मैं और तुम परस्पर एक दूसरे को समर्पित वरना समीकरण का बिगरना तय और फिर जिन्दगी कभी ना मिलने वाली दो समानांतर रेखायें फिर दोषार्पन में जिन्दगी खत्म मित्रों वफा या बेवफा तय नहीं तय सिर्फ समर्पण की भावना रहे हाँ कई गुणनखण्डों के हल शुन्य हो सकते हैं मगर प्रेम के मामले में ये अपवाद तक नहीं

तोड़ जाते हैं दिल अपने ही छलकर के
दुश्मन नहीं आते आसमां से चलकर के
वफा का सुरज जब पुरब से पश्चिम जाये
मोहब्बत रौशन कर आना खुद ही जलकर के

. . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
प्रेम : त्याग का दुसरा नाम
. . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
. . . . . . . .MIND IT. . . . .

Monday, June 25, 2012

कुछ तो है काम खूनी तेरी निगाह का शमशान सा क्योँ अक्स तेरे दरगाह का आईना कह रहा है आज चीख चीखकर आई हो कत्ल करके किसी बेगुनाह का

तेरे बगैर भी देखो जी के मस्त रहता हूँ तुझे सोचकर भी होंठ सी के मस्त रहता हूँ ये और बात है कि तनहा रह नहीं सकता दोस्ती जाम से की और पी के मस्त रहता हूँ

सच को अगर सच कहना गुनाह है बेशक यहाँ हमारा रहना गुनाहहै खाया हूँ ईँट दिल पर पत्थर तो मारूँगा लाचार होके जुल्म को सहना गुनाह है 7

तलवारें भी कदमों तले गुमनाम सी होगी मोहब्बत की खुशबू बिखरने की बात है